बिहार विधान परिषद उच्च सदन है। लेकिन इसके प्रति सरकार का ‘नीच’ व्यवहार किसी से छुपा नहीं है। परिषद एक स्थायी सदन है। इसके सभापति पद की मर्यादा सर्वोपरि है। इसके सभापति का पद रिक्त नहीं छोड़ा जा सकता है। संविधान में भी परिषद सभापति के लिए अलग से प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 184 (1) में कहा गया है कि सभापति का पद रिक्त होने पर उप सभापति कार्यों का संचालन करेंगे। यदि सभापति और उपसभापति दोनों का पद रिक्त हो तो राज्यपाल द्वारा मनोनीत कोई भी परिषद सदस्य कार्यकारी सभापति के कार्यों का निर्वहन कर सकता है। लेकिन आसन को खाली छोड़ने का प्रावधान नहीं है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले 7 मई से परिषद के सभापति का पद रिक्त है। उपसभापति हारुण रसीद की कार्यकाल समाप्त होने के बाद से सभापति कार्यालय में ताला लगा हुआ है। ऐसा लगता है जैसे परिषद का सुहाग उजड़ गया हो। कार्यकारी सभापति के मनोनयन की सुगबुगाहट भी कहीं नहीं सुनायी दे रही है। यह भी संयोग है कि कार्यकारी सभापति के मनोनयन के बिना न सभापति का चुनाव हो सकता है और न निर्वाचित सदस्यों का शपथ ग्रहण।
फिलहाल विधान परिषद की 75 में से 29 सीट रिक्त हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी समेत 6 मंत्री इसी सदन के सदस्य हैं। हालांकि अशोक चौधरी और नीरज कुमार का कार्यकाल पिछले 6 मई को समाप्त हो गया है। लॉकडाउन के कारण परिषद की 17 सीटों का चुनाव अटका हुआ है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या विधान परिषद की हैसियत निगम, बोर्ड या आयोग के समान हो गयी है। क्या विधान परिषद सभापति की औकत आयोगों के अध्यक्ष के समान हो गयी है, जो सरकार के अनुकंपा के अधीन है। या सरकार विधान परिषद भंग करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ‘वीरेंद्र यादव न्यूज’ का आकलन है कि नीतीश कुमार विधान परिषद को समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। ऐसा लगता है कि विधान परिषद राजनीतिक चरागाह और शरणार्थी शिविर में तब्दील हो गयी है। विधायी कार्यों के निर्वहन में इसकी कोई भूमिका नहीं है। यही कारण है कि देश के 22 से अधिक राज्यों में विधान परिषद है ही नहीं। यदि नीतीश कुमार विधान परिषद को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय करते हैं तो यह प्रदेश के आर्थिक समृद्धि में निर्णायक कदम होगा। विधान परिषद एक ‘सफेद हाथी’ है, जिसके रख-रखाव पर प्रति वर्ष अरबों रुपये खर्च होते हैं। इसके नहीं रहने से प्रदेश को रति भर भी नुकसान नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के तीनों प्रमुख पार्टियों के प्रमुख नेता विधान परिषद के ही सदस्य हैं।
हालांकि राज्य सरकार ने परिषद को समाप्त करने की दिशा में अभी कोई कदम नहीं उठाया है, लेकिन सभापति पद को जिस तरह से मजाक बना दिया है, वह विधान परिषद भंग करने की ओर सरकार का पहला कदम हो सकता है। विधान परिषद गठित करने या भंग करने के लिए संबंधित राज्य की विधान सभा का एक संकल्प ही काफी है।
Monday, 1 June 2020
बिहार विधान परिषद को भंग करना चाहती है नीतीश सरकार !
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प्रदेश में सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था विधान परिषद की मर्यादा तार-तार हो रही है। संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है। इसके बाबजूद प्रदेश में कोई विरोध का स्वर नहीं उठ रहा है। लगता है कि बिहार विधान परिषद को भंग करने की कोशिश बिहार में शुरू हो गयी है और उसे निरर्थक बताने का सायश अभियान चलाया जा रहा है। बिहार विधान परिषद को भी किसी राजनीतिक आयोग के तरह सरकार भरोसे छोड़ दिया गया है।
बिहार विधान परिषद उच्च सदन है। लेकिन इसके प्रति सरकार का ‘नीच’ व्यवहार किसी से छुपा नहीं है। परिषद एक स्थायी सदन है। इसके सभापति पद की मर्यादा सर्वोपरि है। इसके सभापति का पद रिक्त नहीं छोड़ा जा सकता है। संविधान में भी परिषद सभापति के लिए अलग से प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 184 (1) में कहा गया है कि सभापति का पद रिक्त होने पर उप सभापति कार्यों का संचालन करेंगे। यदि सभापति और उपसभापति दोनों का पद रिक्त हो तो राज्यपाल द्वारा मनोनीत कोई भी परिषद सदस्य कार्यकारी सभापति के कार्यों का निर्वहन कर सकता है। लेकिन आसन को खाली छोड़ने का प्रावधान नहीं है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले 7 मई से परिषद के सभापति का पद रिक्त है। उपसभापति हारुण रसीद की कार्यकाल समाप्त होने के बाद से सभापति कार्यालय में ताला लगा हुआ है। ऐसा लगता है जैसे परिषद का सुहाग उजड़ गया हो। कार्यकारी सभापति के मनोनयन की सुगबुगाहट भी कहीं नहीं सुनायी दे रही है। यह भी संयोग है कि कार्यकारी सभापति के मनोनयन के बिना न सभापति का चुनाव हो सकता है और न निर्वाचित सदस्यों का शपथ ग्रहण।
फिलहाल विधान परिषद की 75 में से 29 सीट रिक्त हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी समेत 6 मंत्री इसी सदन के सदस्य हैं। हालांकि अशोक चौधरी और नीरज कुमार का कार्यकाल पिछले 6 मई को समाप्त हो गया है। लॉकडाउन के कारण परिषद की 17 सीटों का चुनाव अटका हुआ है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या विधान परिषद की हैसियत निगम, बोर्ड या आयोग के समान हो गयी है। क्या विधान परिषद सभापति की औकत आयोगों के अध्यक्ष के समान हो गयी है, जो सरकार के अनुकंपा के अधीन है। या सरकार विधान परिषद भंग करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ‘वीरेंद्र यादव न्यूज’ का आकलन है कि नीतीश कुमार विधान परिषद को समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। ऐसा लगता है कि विधान परिषद राजनीतिक चरागाह और शरणार्थी शिविर में तब्दील हो गयी है। विधायी कार्यों के निर्वहन में इसकी कोई भूमिका नहीं है। यही कारण है कि देश के 22 से अधिक राज्यों में विधान परिषद है ही नहीं। यदि नीतीश कुमार विधान परिषद को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय करते हैं तो यह प्रदेश के आर्थिक समृद्धि में निर्णायक कदम होगा। विधान परिषद एक ‘सफेद हाथी’ है, जिसके रख-रखाव पर प्रति वर्ष अरबों रुपये खर्च होते हैं। इसके नहीं रहने से प्रदेश को रति भर भी नुकसान नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के तीनों प्रमुख पार्टियों के प्रमुख नेता विधान परिषद के ही सदस्य हैं।
हालांकि राज्य सरकार ने परिषद को समाप्त करने की दिशा में अभी कोई कदम नहीं उठाया है, लेकिन सभापति पद को जिस तरह से मजाक बना दिया है, वह विधान परिषद भंग करने की ओर सरकार का पहला कदम हो सकता है। विधान परिषद गठित करने या भंग करने के लिए संबंधित राज्य की विधान सभा का एक संकल्प ही काफी है।
बिहार विधान परिषद उच्च सदन है। लेकिन इसके प्रति सरकार का ‘नीच’ व्यवहार किसी से छुपा नहीं है। परिषद एक स्थायी सदन है। इसके सभापति पद की मर्यादा सर्वोपरि है। इसके सभापति का पद रिक्त नहीं छोड़ा जा सकता है। संविधान में भी परिषद सभापति के लिए अलग से प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 184 (1) में कहा गया है कि सभापति का पद रिक्त होने पर उप सभापति कार्यों का संचालन करेंगे। यदि सभापति और उपसभापति दोनों का पद रिक्त हो तो राज्यपाल द्वारा मनोनीत कोई भी परिषद सदस्य कार्यकारी सभापति के कार्यों का निर्वहन कर सकता है। लेकिन आसन को खाली छोड़ने का प्रावधान नहीं है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पिछले 7 मई से परिषद के सभापति का पद रिक्त है। उपसभापति हारुण रसीद की कार्यकाल समाप्त होने के बाद से सभापति कार्यालय में ताला लगा हुआ है। ऐसा लगता है जैसे परिषद का सुहाग उजड़ गया हो। कार्यकारी सभापति के मनोनयन की सुगबुगाहट भी कहीं नहीं सुनायी दे रही है। यह भी संयोग है कि कार्यकारी सभापति के मनोनयन के बिना न सभापति का चुनाव हो सकता है और न निर्वाचित सदस्यों का शपथ ग्रहण।
फिलहाल विधान परिषद की 75 में से 29 सीट रिक्त हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी समेत 6 मंत्री इसी सदन के सदस्य हैं। हालांकि अशोक चौधरी और नीरज कुमार का कार्यकाल पिछले 6 मई को समाप्त हो गया है। लॉकडाउन के कारण परिषद की 17 सीटों का चुनाव अटका हुआ है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या विधान परिषद की हैसियत निगम, बोर्ड या आयोग के समान हो गयी है। क्या विधान परिषद सभापति की औकत आयोगों के अध्यक्ष के समान हो गयी है, जो सरकार के अनुकंपा के अधीन है। या सरकार विधान परिषद भंग करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ‘वीरेंद्र यादव न्यूज’ का आकलन है कि नीतीश कुमार विधान परिषद को समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। ऐसा लगता है कि विधान परिषद राजनीतिक चरागाह और शरणार्थी शिविर में तब्दील हो गयी है। विधायी कार्यों के निर्वहन में इसकी कोई भूमिका नहीं है। यही कारण है कि देश के 22 से अधिक राज्यों में विधान परिषद है ही नहीं। यदि नीतीश कुमार विधान परिषद को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय करते हैं तो यह प्रदेश के आर्थिक समृद्धि में निर्णायक कदम होगा। विधान परिषद एक ‘सफेद हाथी’ है, जिसके रख-रखाव पर प्रति वर्ष अरबों रुपये खर्च होते हैं। इसके नहीं रहने से प्रदेश को रति भर भी नुकसान नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि प्रदेश के तीनों प्रमुख पार्टियों के प्रमुख नेता विधान परिषद के ही सदस्य हैं।
हालांकि राज्य सरकार ने परिषद को समाप्त करने की दिशा में अभी कोई कदम नहीं उठाया है, लेकिन सभापति पद को जिस तरह से मजाक बना दिया है, वह विधान परिषद भंग करने की ओर सरकार का पहला कदम हो सकता है। विधान परिषद गठित करने या भंग करने के लिए संबंधित राज्य की विधान सभा का एक संकल्प ही काफी है।
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